Saturday, June 12, 2010

भोपाल गैस त्रासदी ....मेरी अपनी त्रासदी.



बड़े दिनों से खबरों में है मेरा शहर.....अक्सर नहीं रहता ....कुछ घटता ही नहीं. मगर २५ साल पहले कितना कुछ घटा......फिर घटते ही चला गया....इतना घटा कि आम सा हो गया......शहरो की गलियों में पड़े कचड़े जितना आम...कोने में पड़ा रहता है सड़ा सा....लोग लगे रहते है रोजगार के सौदों में.........

उसी सुस्त से शहर का बाशिंदा हूँ मैं ......दावे करता था कुछ वक्त पहले तक उसे बड़ी गहराई से जानने की. पर वो कहावत - गहरे ज़ख्म जिस्म कि सतह पर नहीं दिखते- सच्ची निकली....नहीं दिखे मुझे अपने ही शहर के जख्म....अपने भोपाल के!

दो भागो में बटा भोपाल.....नया भोपाल और पुराना भोपाल. अक्सर पुराने भोपाल आया जाया करते.....बड़ी-छोटी झील,lake view और बड़ी झील के बीच में बना तकिया टापू ,भोपाल का अपना छोटा सा marine drive,खाने के कई भोपाली ठिकाने,चाय कि गुमटिया,मनुआभान टेकरी,ताजुल मस्जिद, गौहर महल,भारत भवन और प्रकृति की सुंदरता............इन सब के बीच कही बोझिल सी ख़ामोशी लिए छुपा बैठापुराने भोपाल का वो निशातपुरा इलाका कही नज़र में आ ही नहीं पाया जहाँ वो जहरीली गैस लाखो खुशिया ले उडी थी......

भोपाल गैस त्रासदी के बारे में मेरी मालूमात उतनी ही थी जितनी बाहर के लोगो को होगी.हाँ,general knowledge बढ़ाने के लिए ये जरुर याद किया था कि जो गैस थी वो Methyl isocynate(MIC) थी और उस का chemical formula C2H3NO था. क्या पता कब कोई पूछ ले कि तुम तो भोपाल के हो बताओ कौन सी गैस रिसी थी !

मेरी नज़र में फालतू ,एक presentation की तैयारी के दौरान जाना भोपाल गैस त्रासदी का सच......वो भी google कर के! कितने टन रिसी,कैसे रिसी,कितनी मरे,कितने प्रभावित,क्या शारीरिक और मानसिक बीमारियाँ फैली, कौन जिम्मेदार सब जाना.............ये भी जाना कैसे हाथ-ठेलो में भर कर लाशें ले जाई गयी,कैसे लोग सोते सोते ही मर गए,जो जग गए वो सडको पे आ कर दम घुटने से मरे,आँखों में जैसे लाल मिर्च झोंक दी हो,नाक से पानी रिस रहा हो,मुह से झाग निकल रहा हो ,कैसे परिवार के बड़े बिछड़े और छोटों पर उनके छोटों कि जिम्मेदारी आ गयी,कैसे जिम्मेदारी के लिए पढाई छोड़ कर चाय कि दुकान पे ग्लास धोए.........और कैसे आज भी सेकडों टन toxic अभी भी वही पड़ा है, जिसको हमारे पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश सिर्फ हाथ में लेकर non-toxic घोषित कर चुके है.....

ये भी जाना कि कैसे लोग अपने-अपने शहर छोड़ कर भोपाल आये पीडितों कि मदद करने और फिर ताउम्र यही रह कर उनका दर्द साझा किया,एक आन्दोलन का हिस्सा बने, किसी ने अमेरिका में dow की नौकरी छोड़ीं और भोपाल आई,किसी novelist ने इस शहर कि त्रासदी पर animal’s people लिखी,कैसे लोगो ने संवेदनशील फिल्में बनायीं,कैसे बाहर से आये किसी शख्स की कोशिशो की वजह से सरकारी अस्पताल से बेहतर सुविधाए आम लोगो कि मदद से तैयार संभावना अस्पताल में मिली.....................

इतना कुछ जाना है कि कागज पे कागज लिख सकता हूँ मैं.

साथ में ये भी जाना कि कितना अनजान था मैं अपने आस पड़ोस से......मुझ जैसे और भी होंगे.....किताबो से सर बाहर निकलते तो शहर दिखता,लोग दिखते....किताबो के अंदर तो बस सुनहरा भविष्य दिखता था अपना.

उस शहर में रह कर मेरे पास कितना कुछ था लोगो के लिए करने को...और मैं वही “कुछ करने” कि सम्भावनाये तलाशने दूसरे शहरों में भटकता रहा......आज भी.

आज जब सब गुनहगार तलाश रहे है-एक दूसरे पे आरोप प्रत्यारोप का लंबा चलने वाला खेल खेल रहे है.......कभी anderson,कभी अर्जुन सिंह,कभी राजीव गाँधी,कभी ये कभी वो.......मैं उंगलियां उठा ही नहीं पता किसी पे.......जब खुद हम ही कुछ ना कर पाए तो दूसरों को क्या सजाए-मौत सुनाना !

मेरी टीस शायद बस ये है कि हम अनजान क्यों रहते है अपने ही आस-पास से इतना .....

और गर भोपाल गैस त्रासदी के बारे में जिज्ञासा जगी हो तो ये websites जरुर visit करे.....

www.bhopal.org

www.bhopal.net

www.studentsforbhopal.org

No comments:

Post a Comment