Saturday, May 29, 2010

सीखों !

मजदूर हो, बनना सीखों l

कीड़े हो, कुचले जाना सीखों l

तुम्हारे जैसे सब नौकर पाले है हमने,

उन्ही के हाथों की लकीर तुम्हारी है, समझना सीखों l

खून तुम्हारा पैदा होते ही पनीला था,

उबाल आ नहीं सकता,

गुस्सा दिखाना मत सीखों l

त्योरियाँ चढ़ जाती हैं,

उंगलियां उठ जाती हैं,

इसलिए मन का मौजी बनना मत सीखों l

सच के नाम पर फरेब बेचतीं दुनिया,

साथ हो लिए तो नौकर,

नहीं तो कुत्ते की मौत मरना सीखों l

क्या तुम नया करने चले हो,

हर चीज तो मुक़मल है,

बस हमारे पीछे आना सीखों l

वो दौर गए जब लोग लपट हुआ करते थे,

अब चिंगारी बन के बुझना सीखों l

दुष्यंत के शेरों को पढ़ना नहीं,

साहिर कि बातों को समझना नहीं,

बस हमारे फेसलो कि इबारत करना सीखों l

तुम्हारी तामीर है मजदूर बनना,

फडफडाना छोडो,

मालिकों की कद्र करना सीखों l

ऐसी क्या उड़ान भरना चाहते हो तुम,

अपने आस-पास तो देखो,

अपने दोस्तों की तरह हम्माली करना सीखों l

कुछ ही तो लाशें पड़ी है,

कुछ ही तो बेवाए रोई है,

दुनिया खूबसूरत हैं,इसे खूबसूरत समझना सीखों l

ये लिखो मत ,

वो पढ़ो मत ,

आँख-कान बंद कर के जीना है कैसे, ये सीखों l

ये मत कहो,

वो मत बोलो ,

बेहतर है मुह ना खोलो ,

ये है गाँधी के आज के बन्दर ,इन्ही को समझना सीखों l


फूलों की तरह सुनहरे सपनो को कुचलना सीखों l

कुछ बदलने की ख्वाहिश रखना, छोड़ना सीखों l

मातम के बीच भी खुश रहना सीखों l

दिल में कोई नया ख्याल आये तो झट से उसे दबाना सीखों l

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