“क्या चेहरा है...जैसे उदास सी हसीन आखें जड़ दी हो मोनालिसा पर...बाल देखे उसके..बलखाती नदी की तरह लहरा रहे है...वो भी वर्टिकली डाउनवर्डस !
ये मेरा रोजमर्रा का काम है...लड़कियाँ टापना...वैसे तो मैं चाय की टपरी पर,माल्स में,बस स्टैंड पर, नूतन-श्रीराम जैसे कॉलेजो आदि आदि दर्शन-स्थलों को इस काम के लिए ज्यादा तरजीह देता हूं मगर चूँकि इस नीले आसमान के नीचे कि पूरी धरती हमारी है, इसलिए आज नाई की दुकान ही मेरा दर्शन-स्थल है. भरे-पूरे बालों वालो से भरी पड़ी थी दुकान....पूरे हिंदुस्तान की आज छुट्टी जो होती है...रविवार को. कुछ न्यूज़पेपर में डूबे हुए थे,कुछ आपस में बतिया रहे थे,तो कुछ कुर्सी पर बैठे छोरे के बाल ही बनते हुए देख रहे थे! और मैं इस पारदर्शी कांच के दरवाजे के बाहर आँखे गडाये बैठा था....कि कब कोई चिड़िया फुदकती हुई आये और में इस स्थल में दर्शन कर के धन्य होऊ.
“वैसे मैं हमेशा ऐसा कहा था...पहले तो में सात जन्मों तक साथ रहने की कसमें खाने वाली अपनी प्रेमिका के ही दर्शन करता था बस. मगर जब से उसने मुझे डिच (ditch) किया तब से मैंने टापने को ही अपना धर्म बना लिया ” अपने आप को मासूम साबित कने वाले इस monologueमें मैं डूबा हुआ ही था कि मेरी नज़र उस से टकराई ,और इधर दुकान में बजते रेडियो ने गाना शुरू किया...”रंजिशे ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ’...बेफालतू सा अजीब इतेफ़ाक!!!
हल्की सी बस झलक ही मिली ही थी और वो गायब...क्या मुस्कुराहट थी...मासूम सी-सच्ची सी...जैसे अभी बस इस झूठी दुनिया से झूठ-फरेब का नामोनिशान ही मिटा देगी, अपनी मुस्कुराहट से. कुछ देर बाद, खम्बे के पास खड़ी उस आखिरी दुकान से निकल के आई वो...इठलाती मुस्कुराती...और फिर आखिरी से सटी खड़ी दूसरी दुकान में चली गयी. चूडियाँकैसे खनक रही थी उसके हाथों में...क्या कोई आठवां सुर निकला होगा? वो फिर बाहर आई और तीसरी दुकान में चली गयी...ना जाने क्या ढूंढ रही होगी? चौथी दुकान में जाने से पहले मेरी चोर निगाहें पकड़ ही ली उस ने...और मुस्कुराई भी.अब तो बात करना बनता है, किसी भी कीमत पर...क्या करेगी वो मुझसे बात? वो दुकानों में जाती रही,निकलती रही और हर बार उसमें कुछ नया मिलता रहा मुझे...किसी गुंचे सा तो कभी किसी रूह सा...
इस नाई की दुकान से सटी दुकान में गयी है वो अभी अभी...जोर से धडका था दिल मेरा...काफ़ी दिनों से इतनी जोर से नहीं धडका...आज डेट के लिए पूछूँगा मैं इसे....पक्का!
तभी वो करीने से खड़ी इन दुकानों की आखिरी दुकान में दाखिल होने लगी...नाई की दुकान में...और मेरे बाजू में आ कर खड़ी हो गयी....क्यों? क्या अपने बाप के लिए विग चाहिए इसे!
उसने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराई...इतने गहरे भिदी उसकी आँखे की मुझे अंदाजा नहीं था, कि मेरा दिल इतनी गहराई लिए भी हो सकता है.
और उस के बाद सब कुछ स्लो मोशन में घटित हुआ .
उसने दुकान के सबसे बड़े नऊए की तरफ देख कर कहा.....’ओए!’.....वो बोला ‘क्या है री’.....उसके चूडियो से भरे दोनों हाथ धीरे-धीरे हवा में उठे, मिले और तपाक से अलग हो गए....एक आवाज हुई ....ताली की आवाज़ –जो आज भी गूंजती है कानो में मेरे कभी-कभी- उस तरह की आवाज़ जैसी इस दुनिया में कुछ खास किस्म के लोग ही पैदा कर सकते है....फिर एक और आवाज़ हुई....”ए चल होली का चंदा निकाल”.
जाते-जाते उसने मुझे देखा.....सर पर हँसते हुए अपना हाथ फेरा और बोली...’ए चिकने तू नहीं देगा”.इतनी जोर से कभी नहीं धड़का था दिल मेरा.मैंने सर उठाये बिना जेब में रखा आखिरी गाँधी उसे दे दिया.वो हँसते हुए बाहर चली गयी....वैसी ही हँसी...मासूम सी-सच्ची सी.जाते हुए देखा था मैंने उसे.क्या उसे समझ आ गयी थी मेरी नज़र?
क्या आप जानते हो दोस्तों.....मैं उस के साथ डेट पर नहीं गया.वो एक छक्का थी.हिजड़ा थी..........इंसान नहीं थी क्या?
हम जैसे बहुतेरे लोग जो अपने आप को सिनेमा का समझदार आदमी...बोले तो intellect समझते है (असल में हम में से ज्यादातर लोग कुछ नहीं समझते...अंग्रेजी के pseudo-intellect की जमात में आते है) ये नहीं समझ पा रहे की दबंग काहे मन को है भाई..........पुरी दुनिया को गली ना देकर अगर अपनी बात कहू तो सिनेमा हॉल के बाहर आ कर दिमाग चकरा जाता है कि साला दबंग कैसे पसंद आ सकती है.....हम तो सिनेमा को Art समझते है वो भी अव्वल दर्जे की.....”हट-के” फिल्मो के दीवाने....अलग तरह की कहानी..अलग तरह की cinematography-background score..बिलकुल real एक्टिंग ..तीन-चार लेवेल्स पर उलझी कहानी....अलग तरह की disturbing ending....सपाट शब्दों में बोले तो Multiplex वाली पिक्चरें!!!! Peepli live की निर्देशिका अनुषा रिजवी बोल बोल के अपना गला सुखवा बैठीं की उनकी peepli live सिर्फ multiplex के दर्शकों के लिए नहीं है...बल्कि वो चाहती है की मध्य प्रदेश,उतर प्रदेश,बिहार के शहरों और गाँवों में भी ये फिल्म देखी जाए...ये उन्ही लोगो कि फिल्म है ...मगर peepli live तो सिर्फ Multiplexes तक ही सिमट कर रह गयी.....किसान कि फसल किसान तक ही नहीं पहुच पायी! इतनी लंबी बक-बक इसलिए की ये बात समझ आये की सिनेमा अब सिर्फ multiplex तक सिमट कर रह गया है......250-300 में कोई फिल्म-साथ में 100 का popcorn- देखना कोई खुशी की बात नहीं है .....बाजार कि ताकतें नचाये और हम नाचते रहे...वही पुरानी आदत! दबंग कि उड़ान इसलिए अलग है क्योंकि वो multiplex तक सीमित रहने कि बजाये आम आदमी तक भी पहुचती है single screen theater और cineplex के जरिये......और सलमान ने पहली बार तो ऐसा किया नहीं......”तेरे नाम” के समय भोपाल के राज टाकीज नाम के single screen theater की वो समुद्रीय भीड़ छपी हुई है स्मृति में.......बोले तो बात सिर्फ इतनी सी है कि सिनेमा खास तौर पर हिंदी सिनेमा अब सिर्फ एक वर्ग-विशेष के लिए रह गया है ......अगर फिल्में जैसी चीजे भी आम आदमी की approach से बाहर हो रही है तो इस पर सोचना तो बनता है बॉस! साथ ही एक अलग तरह का हीरो भी निकला ये चुलबुल पाण्डे.....या तो positive रहा हीरो अब तक या इस बदलते दौर के साथ Grey shades में दिखता रहा,मगर दबंग में चुलबुल पांडे पुरी तरह negative है....और हमें पता भी नहीं चलता......पुरी तरह से मतलबी,सिर्फ अपने लिए जीने वाला,ना समाज कि फिक्र ना फिल्म के आखिर में “हृदय-परिवर्तन” वाला ड्रामा...जैसा था वैसा है....फिर भी हम शिकायत नहीं करते.....मज़ा मारते है और घर चले जाते है ....अब तो कोई social theorist ही समाज को फिर से समझ के हमें समझा सकता है कि ऐसा क्यों????????
साथ ही हम जैसे लोगो के ज़हन में बसे एक और सिद्धांत को हिलती है ये......की फिल्म सिर्फ “सिनेमा के समझदार आदमी” के लिए ही नहीं है....आम आदमी के लिए भी है....जिसे पैसा वसूल मनोरंजन चाहिए.....अलबता अभी भी हमारा दिमाग तो ये मानने से इनकार करता है ....और बस अनुराग कश्यप,विशाल भारद्वाज,दिबाकर बनर्जी,श्याम बेनेगल,हृषिकेश मुख़र्जी,गुरुदत्त सरीखे को ही सिनेमा की समझ वाला आदमी मानता है....मगर बीच बीच में आती दबंग जैसी फिल्मे हमारे इस सिद्धांत को हिलाती जरुर है......और सवाल छोड़ जाती है कि सिनेमा समाज का आइना है या ........समाज की उस आईने में उभरती उसकी असली तस्वीर से दूर ले जा कर एक अलग खूबसूरत दुनिया दिखाने का भ्रम पैदा करने वाला साधन???? आखिर में एक दिलचस्प मूल्यांकन........दबंग का जो नया निर्देशक है अभिनव कश्यप वो अनुराग कश्यप का छोटा भाई है!!!!कितना अंतर है दोनों के लिए “entertainment” शब्द का.एक ही स्थान पर दो धाराएँ विपरीत दिशा में भी बह सकती है प्यारे!! और सबसे आखिर में Akira Kurosawa का एक मस्त quote..... “It is wonderful to create”.
बड़े दिनों से खबरों में है मेरा शहर.....अक्सर नहीं रहता ....कुछ घटता ही नहीं. मगर २५ साल पहले कितना कुछ घटा......फिर घटते ही चला गया....इतना घटा कि आम सा हो गया......शहरो की गलियों में पड़े कचड़े जितना आम...कोने में पड़ा रहता है सड़ा सा....लोग लगे रहते है रोजगार के सौदों में.........
उसी सुस्त से शहर का बाशिंदा हूँ मैं ......दावे करता था कुछ वक्त पहले तक उसे बड़ी गहराई से जानने की. पर वो कहावत - गहरे ज़ख्म जिस्म कि सतह पर नहीं दिखते- सच्ची निकली....नहीं दिखे मुझे अपने ही शहर के जख्म....अपने भोपाल के!
दो भागो में बटा भोपाल.....नया भोपाल और पुराना भोपाल. अक्सर पुराने भोपाल आया जाया करते.....बड़ी-छोटी झील,lake view और बड़ी झील के बीच में बना तकिया टापू ,भोपाल का अपना छोटा सा marine drive,खाने के कई भोपाली ठिकाने,चाय कि गुमटिया,मनुआभान टेकरी,ताजुल मस्जिद, गौहर महल,भारत भवन और प्रकृति की सुंदरता............इन सब के बीच कही बोझिल सी ख़ामोशी लिए छुपा बैठापुराने भोपाल का वो निशातपुरा इलाका कही नज़र में आ ही नहीं पाया जहाँ वो जहरीली गैस लाखो खुशिया ले उडी थी......
भोपाल गैस त्रासदी के बारे में मेरी मालूमात उतनी ही थी जितनी बाहर के लोगो को होगी.हाँ,general knowledge बढ़ाने के लिए ये जरुर याद किया था कि जो गैस थी वो Methyl isocynate(MIC) थी और उस का chemical formula C2H3NO था. क्या पता कब कोई पूछ ले कि तुम तो भोपाल के हो बताओ कौन सी गैस रिसी थी !
मेरी नज़र में फालतू ,एक presentation की तैयारी के दौरान जाना भोपाल गैस त्रासदी का सच......वो भी google कर के! कितने टन रिसी,कैसे रिसी,कितनी मरे,कितने प्रभावित,क्या शारीरिक और मानसिक बीमारियाँ फैली, कौन जिम्मेदार सब जाना.............ये भी जाना कैसे हाथ-ठेलो में भर कर लाशें ले जाई गयी,कैसे लोग सोते सोते ही मर गए,जो जग गए वो सडको पे आ कर दम घुटने से मरे,आँखों में जैसे लाल मिर्च झोंक दी हो,नाक से पानी रिस रहा हो,मुह से झाग निकल रहा हो ,कैसे परिवार के बड़े बिछड़े और छोटों पर उनके छोटों कि जिम्मेदारी आ गयी,कैसे जिम्मेदारी के लिए पढाई छोड़ कर चाय कि दुकान पे ग्लास धोए.........और कैसे आज भी सेकडों टन toxic अभी भी वही पड़ा है, जिसको हमारे पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश सिर्फ हाथ में लेकर non-toxic घोषित कर चुके है.....
ये भी जाना कि कैसे लोग अपने-अपने शहर छोड़ कर भोपाल आये पीडितों कि मदद करने और फिर ताउम्र यही रह कर उनका दर्द साझा किया,एक आन्दोलन का हिस्सा बने, किसी ने अमेरिका में dow की नौकरी छोड़ीं और भोपाल आई,किसी novelist ने इस शहर कि त्रासदी पर animal’s people लिखी,कैसे लोगो ने संवेदनशील फिल्में बनायीं,कैसे बाहर से आये किसी शख्स की कोशिशो की वजह से सरकारी अस्पताल से बेहतर सुविधाए आम लोगो कि मदद से तैयार संभावना अस्पताल में मिली.....................
इतना कुछ जाना है कि कागज पे कागज लिख सकता हूँ मैं.
साथ में ये भी जाना कि कितना अनजान था मैं अपने आस पड़ोस से......मुझ जैसे और भी होंगे.....किताबो से सर बाहर निकलते तो शहर दिखता,लोग दिखते....किताबो के अंदर तो बस सुनहरा भविष्य दिखता था अपना.
उस शहर में रह कर मेरे पास कितना कुछ था लोगो के लिए करने को...और मैं वही “कुछ करने” कि सम्भावनाये तलाशने दूसरे शहरों में भटकता रहा......आज भी.
आज जब सब गुनहगार तलाश रहे है-एक दूसरे पे आरोप प्रत्यारोप का लंबा चलने वाला खेल खेल रहे है.......कभी anderson,कभी अर्जुन सिंह,कभी राजीव गाँधी,कभी ये कभी वो.......मैं उंगलियां उठा ही नहीं पता किसी पे.......जब खुद हम ही कुछ ना कर पाए तो दूसरों को क्या सजाए-मौत सुनाना !
मेरी टीस शायद बस ये है कि हम अनजान क्यों रहते है अपने ही आस-पास से इतना .....
और गर भोपाल गैस त्रासदी के बारे में जिज्ञासा जगी हो तो ये websites जरुर visit करे.....