Monday, December 20, 2010

........छोटी सी इक कहानी


“क्या चेहरा है...जैसे उदास सी हसीन आखें जड़ दी हो मोनालिसा पर...बाल देखे उसके..बलखाती नदी की तरह लहरा रहे है...वो भी वर्टिकली डाउनवर्डस !

ये मेरा रोजमर्रा का काम है...लड़कियाँ टापना...वैसे तो मैं चाय की टपरी पर,माल्स में,बस स्टैंड पर, नूतन-श्रीराम जैसे कॉलेजो आदि आदि दर्शन-स्थलों को इस काम के लिए ज्यादा तरजीह देता हूं मगर चूँकि इस नीले आसमान के नीचे कि पूरी धरती हमारी है, इसलिए आज नाई की दुकान ही मेरा दर्शन-स्थल है. भरे-पूरे बालों वालो से भरी पड़ी थी दुकान....पूरे हिंदुस्तान की आज छुट्टी जो होती है...रविवार को. कुछ न्यूज़पेपर में डूबे हुए थे,कुछ आपस में बतिया रहे थे,तो कुछ कुर्सी पर बैठे छोरे के बाल ही बनते हुए देख रहे थे! और मैं इस पारदर्शी कांच के दरवाजे के बाहर आँखे गडाये बैठा था....कि कब कोई चिड़िया फुदकती हुई आये और में इस स्थल में दर्शन कर के धन्य होऊ.

“वैसे मैं हमेशा ऐसा कहा था...पहले तो में सात जन्मों तक साथ रहने की कसमें खाने वाली अपनी प्रेमिका के ही दर्शन करता था बस. मगर जब से उसने मुझे डिच (ditch) किया तब से मैंने टापने को ही अपना धर्म बना लिया ” अपने आप को मासूम साबित कने वाले इस monologue में मैं डूबा हुआ ही था कि मेरी नज़र उस से टकराई ,और इधर दुकान में बजते रेडियो ने गाना शुरू किया...”रंजिशे ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ’...बेफालतू सा अजीब इतेफ़ाक!!!

हल्की सी बस झलक ही मिली ही थी और वो गायब...क्या मुस्कुराहट थी...मासूम सी-सच्ची सी...जैसे अभी बस इस झूठी दुनिया से झूठ-फरेब का नामोनिशान ही मिटा देगी, अपनी मुस्कुराहट से. कुछ देर बाद, खम्बे के पास खड़ी उस आखिरी दुकान से निकल के आई वो...इठलाती मुस्कुराती...और फिर आखिरी से सटी खड़ी दूसरी दुकान में चली गयी. चूडियाँ कैसे खनक रही थी उसके हाथों में...क्या कोई आठवां सुर निकला होगा? वो फिर बाहर आई और तीसरी दुकान में चली गयी...ना जाने क्या ढूंढ रही होगी? चौथी दुकान में जाने से पहले मेरी चोर निगाहें पकड़ ही ली उस ने...और मुस्कुराई भी.अब तो बात करना बनता है, किसी भी कीमत पर...क्या करेगी वो मुझसे बात? वो दुकानों में जाती रही,निकलती रही और हर बार उसमें कुछ नया मिलता रहा मुझे...किसी गुंचे सा तो कभी किसी रूह सा...

इस नाई की दुकान से सटी दुकान में गयी है वो अभी अभी...जोर से धडका था दिल मेरा...काफ़ी दिनों से इतनी जोर से नहीं धडका...आज डेट के लिए पूछूँगा मैं इसे....पक्का!

तभी वो करीने से खड़ी इन दुकानों की आखिरी दुकान में दाखिल होने लगी...नाई की दुकान में...और मेरे बाजू में आ कर खड़ी हो गयी....क्यों? क्या अपने बाप के लिए विग चाहिए इसे!

उसने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराई...इतने गहरे भिदी उसकी आँखे की मुझे अंदाजा नहीं था, कि मेरा दिल इतनी गहराई लिए भी हो सकता है.

और उस के बाद सब कुछ स्लो मोशन में घटित हुआ .

उसने दुकान के सबसे बड़े नऊए की तरफ देख कर कहा.....’ओए!’.....वो बोला ‘क्या है री’.....उसके चूडियो से भरे दोनों हाथ धीरे-धीरे हवा में उठे, मिले और तपाक से अलग हो गए....एक आवाज हुई ....ताली की आवाज़ –जो आज भी गूंजती है कानो में मेरे कभी-कभी- उस तरह की आवाज़ जैसी इस दुनिया में कुछ खास किस्म के लोग ही पैदा कर सकते है....फिर एक और आवाज़ हुई....”ए चल होली का चंदा निकाल”.


जाते-जाते उसने मुझे देखा.....सर पर हँसते हुए अपना हाथ फेरा और बोली...’ए चिकने तू नहीं देगा”.इतनी जोर से कभी नहीं धड़का था दिल मेरा.मैंने सर उठाये बिना जेब में रखा आखिरी गाँधी उसे दे दिया.वो हँसते हुए बाहर चली गयी....वैसी ही हँसी...मासूम सी-सच्ची सी.जाते हुए देखा था मैंने उसे.क्या उसे समझ आ गयी थी मेरी नज़र?

क्या आप जानते हो दोस्तों.....मैं उस के साथ डेट पर नहीं गया.वो एक छक्का थी.हिजड़ा थी..........इंसान नहीं थी क्या?

- शुभ

1 comment:

  1. arey abse hi celebrity ke lakshan dikhaye de rahe hai, kudh ka blog, wah wah..............

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