Wednesday, September 15, 2010

दबंग-चुलबुल पाण्डे काहे मन को भाए ??????

हम जैसे बहुतेरे लोग जो अपने आप को सिनेमा का समझदार आदमी...बोले तो intellect समझते है (असल में हम में से ज्यादातर लोग कुछ नहीं समझते...अंग्रेजी के pseudo-intellect की जमात में आते है) ये नहीं समझ पा रहे की दबंग काहे मन को है भाई..........पुरी दुनिया को गली ना देकर अगर अपनी बात कहू तो सिनेमा हॉल के बाहर आ कर दिमाग चकरा जाता है कि साला दबंग कैसे पसंद आ सकती है.....हम तो सिनेमा को Art समझते है वो भी अव्वल दर्जे की.....”हट-के” फिल्मो के दीवाने....अलग तरह की कहानी..अलग तरह की cinematography-background score..बिलकुल real एक्टिंग ..तीन-चार लेवेल्स पर उलझी कहानी....अलग तरह की disturbing ending....सपाट शब्दों में बोले तो Multiplex वाली पिक्चरें!!!!
Peepli live की निर्देशिका अनुषा रिजवी बोल बोल के अपना गला सुखवा बैठीं की उनकी peepli live सिर्फ multiplex के दर्शकों के लिए नहीं है...बल्कि वो चाहती है की मध्य प्रदेश,उतर प्रदेश,बिहार के शहरों और गाँवों में भी ये फिल्म देखी जाए...ये उन्ही लोगो कि फिल्म है ...मगर peepli live तो सिर्फ Multiplexes तक ही सिमट कर रह गयी.....किसान कि फसल किसान तक ही नहीं पहुच पायी! इतनी लंबी बक-बक इसलिए की ये बात समझ आये की सिनेमा अब सिर्फ multiplex तक सिमट कर रह गया है......250-300 में कोई फिल्म-साथ में 100 का popcorn- देखना कोई खुशी की बात नहीं है .....बाजार कि ताकतें नचाये और हम नाचते रहे...वही पुरानी आदत! दबंग कि उड़ान इसलिए अलग है क्योंकि वो multiplex तक सीमित रहने कि बजाये आम आदमी तक भी पहुचती है single screen theater और cineplex के जरिये......और सलमान ने पहली बार तो ऐसा किया नहीं......”तेरे नाम” के समय भोपाल के राज टाकीज नाम के single screen theater की वो समुद्रीय भीड़ छपी हुई है स्मृति में.......बोले तो बात सिर्फ इतनी सी है कि सिनेमा खास तौर पर हिंदी सिनेमा अब सिर्फ एक वर्ग-विशेष के लिए रह गया है ......अगर फिल्में जैसी चीजे भी आम आदमी की approach से बाहर हो रही है तो इस पर सोचना तो बनता है बॉस!
साथ ही एक अलग तरह का हीरो भी निकला ये चुलबुल पाण्डे.....या तो positive रहा हीरो अब तक या इस बदलते दौर के साथ Grey shades में दिखता रहा,मगर दबंग में चुलबुल पांडे पुरी तरह negative है....और हमें पता भी नहीं चलता......पुरी तरह से मतलबी,सिर्फ अपने लिए जीने वाला,ना समाज कि फिक्र ना फिल्म के आखिर में “हृदय-परिवर्तन” वाला ड्रामा...जैसा था वैसा है....फिर भी हम शिकायत नहीं करते.....मज़ा मारते है और घर चले जाते है ....अब तो कोई social theorist ही समाज को फिर से समझ के हमें समझा सकता है कि ऐसा क्यों????????

साथ ही हम जैसे लोगो के ज़हन में बसे एक और सिद्धांत को हिलती है ये......की फिल्म सिर्फ “सिनेमा के समझदार आदमी” के लिए ही नहीं है....आम आदमी के लिए भी है....जिसे पैसा वसूल मनोरंजन चाहिए.....अलबता अभी भी हमारा दिमाग तो ये मानने से इनकार करता है ....और बस अनुराग कश्यप,विशाल भारद्वाज,दिबाकर बनर्जी,श्याम बेनेगल,हृषिकेश मुख़र्जी,गुरुदत्त सरीखे को ही सिनेमा की समझ वाला आदमी मानता है....मगर बीच बीच में आती दबंग जैसी फिल्मे हमारे इस सिद्धांत को हिलाती जरुर है......और सवाल छोड़ जाती है कि सिनेमा समाज का आइना है या ........समाज की उस आईने में उभरती उसकी असली तस्वीर से दूर ले जा कर एक अलग खूबसूरत दुनिया दिखाने का भ्रम पैदा करने वाला साधन????
आखिर में एक दिलचस्प मूल्यांकन........दबंग का जो नया निर्देशक है अभिनव कश्यप वो अनुराग कश्यप का छोटा भाई है!!!!कितना अंतर है दोनों के लिए “entertainment” शब्द का.एक ही स्थान पर दो धाराएँ विपरीत दिशा में भी बह सकती है प्यारे!!
और सबसे आखिर में Akira Kurosawa का एक मस्त quote.....
“It is wonderful to create”.